श्रीमद्भगवद्गीता

Vibhooti Yogaश्लोक 37/4288%

Bhagavad Gita 10.37

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ। मुनियोंमें वेदव्यास और कवियोंमें कवि शुक्राचार्य भी मैं हूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Of the Vrsnis, I am Vasudeva; of the Pandavas, I am Arjuna; of sages, I am Vyasa; and of seers, I am Usana (Sukra).

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

इस श्लोक में भगवान ऐसी विभूतियाँ बताते हैं जो अर्जुन के अपने जीवन से जुड़ी हैं, और उनमें एक मधुर आत्मीयता है। 'वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि', वृष्णिवंशियों में वासुदेव मैं हूँ; 'पाण्डवानां धनञ्जयः', पाण्डवों में धनञ्जय, अर्थात् अर्जुन, मैं हूँ; 'मुनीनामप्यहं व्यासः', मुनियों में वेदव्यास मैं हूँ; 'कवीनामुशना कविः', और कवियों में शुक्राचार्य मैं हूँ। कल्पना कीजिए, अर्जुन यह सुन रहा है: पाण्डवों में धनञ्जय मैं हूँ, अर्थात् तुम मेरी विभूति हो। जो अर्जुन अभी कुछ समय पहले शोक में डूबा था, स्वयं को अयोग्य और कायर समझ रहा था, उसे भगवान कहते हैं कि तुममें मेरा तेज है। यह एक गुरु का अपने शिष्य पर सबसे बड़ा विश्वास है। कभी-कभी किसी को उसकी अपनी महिमा का स्मरण कराना ही उसे खड़ा कर देता है। और 'वासुदेव', स्वयं श्रीकृष्ण, वृष्णिवंश में। भगवान अपने मानव रूप को भी अपनी विभूति कहते हैं। फिर व्यास जी, जिन्होंने वेदों का विभाजन किया और यह महाभारत रचा, जिसके भीतर यह गीता है। इस प्रकार इस श्लोक में गीता का वक्ता, श्रोता और लेखक, तीनों एक साथ भगवान की विभूति बनकर उपस्थित हैं। यह श्लोक आपको स्मरण कराता है कि आप भी उनकी विभूति के अंश हैं। जब आप स्वयं को दुर्बल या अयोग्य अनुभव करें, तब यह वचन स्मरण कीजिए: जिसने अर्जुन में अपना तेज देखा, वह आपमें भी देखता है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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