श्री भगवानुवाचअभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्
śhrī-bhagavān uvācha abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam
the Supreme Divine Personality said
fearlessness
purity of mind
knowledge
spiritual
steadfastness
charity
control of the senses
and
performance of sacrifice
and
study of sacred books
austerity
straightforwardness
अर्थMeaning
श्रीभगवान् बोले -- भयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
The Lord said, "Fearlessness, purity of mind, devotion to meditation on the knowledge of the self, alms-giving, self-control, worship, study of the Vedas, austerity, and uprightness—
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
सोलहवाँ अध्याय, 'दैवासुरसम्पद्विभागयोग', मनुष्य के भीतर के दो संसारों का चित्र है: प्रकाश का और अन्धकार का। भगवान पहले उन गुणों की सूची आरम्भ करते हैं जिन्हें वे 'दैवी सम्पदा', दिव्य सम्पत्ति, कहते हैं। यह सूची तीन श्लोकों तक चलती है। 'अभयं सत्त्वसंशुद्धिः', निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि, 'ज्ञानयोगव्यवस्थितिः', ज्ञान के लिए योग में दृढ़ स्थिति, 'दानं दमश्च यज्ञश्च', दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ, 'स्वाध्यायस्तप आर्जवम्', स्वाध्याय, तप और सरलता। इस सूची का पहला शब्द ध्यान देने योग्य है: 'अभयम्', निर्भयता। भगवान दैवी गुणों की सूची किसी पूजा या नियम से नहीं, बल्कि भय के अभाव से आरम्भ करते हैं। क्यों? क्योंकि भय ही अधिकांश दोषों की जड़ है। हम झूठ बोलते हैं, क्योंकि सत्य से डरते हैं। हम लोभ करते हैं, क्योंकि अभाव से डरते हैं। हम क्रोध करते हैं, क्योंकि अपमान से डरते हैं। जो भगवान पर पूर्ण विश्वास रखता है, उसके भीतर भय का स्थान नहीं रहता। इन गुणों को 'सम्पदा' कहा गया है, धन, सम्पत्ति। संसार धन को सोने-चाँदी में गिनता है, पर भगवान कहते हैं कि सच्ची सम्पत्ति ये गुण हैं। सोना चोर ले जा सकता है, पर निर्भयता, शुद्धता और सरलता को कोई छीन नहीं सकता। और ये मृत्यु के बाद भी साथ जाते हैं। 'आर्जवम्', सरलता, इस सूची का अन्तिम शब्द है: मन, वाणी और कर्म में एकता। यह श्लोक आपको अपनी सम्पत्ति गिनने का एक नया ढंग देता है। आज अपने भीतर देखिए कि इनमें से कौन-से गुण आपके पास हैं, और उन्हें और बढ़ाने का प्रयत्न कीजिए।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
इन छब्बीस गुणों में से वह एक पहचानो जो तुममें अभी सबसे प्रबल है — और वह जो सबसे अनुपस्थित। प्रबल तुम्हारा मंच है; अनुपस्थित तुम्हारी वृद्धि का किनारा। आज उस अनुपस्थित गुण की ओर एक छोटा कदम बढ़ाओ।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
तुलनात्मक अध्ययन में अनेक धार्मिक और दार्शनिक परम्पराओं में साहस, सत्यनिष्ठा, उदारता और करुणा जैसे गुणों की चर्चा मिलती है, पर उनका अर्थ, महत्व और सीमा संस्कृतियों में अलग हो सकती है। इसलिए उन्हें सभी परम्पराओं का एक जैसा या सर्वमान्य मूल्य कहना अतिशयोक्ति होगी। गीता की दैवी सम्पदा इन व्यापक नैतिक चर्चाओं से संवाद करती है। यह समानता नैतिक चिंतन का तुलनात्मक संकेत है, वैज्ञानिक निष्कर्ष या श्लोक का प्रमाण नहीं।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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