त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्
tri-vidhaṁ narakasyedaṁ dvāraṁ nāśhanam ātmanaḥ kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṁ tyajet
three types of
to the hell
this
gates
destruction
self
lust
anger
and
greed
therefore
these
three
should abandon
अर्थMeaning
काम, क्रोध और लोभ -- ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Desire, wrath, and greed—these are the three gateways to Naraka, ruinous to the self. Therefore, one should abandon these three.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
आसुरी स्वभाव का पूरा विवेचन करने के बाद भगवान अब उसका मूल एक सूत्र में दे देते हैं, और यह गीता के सबसे व्यावहारिक श्लोकों में से एक है। 'त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः', नरक के ये तीन द्वार आत्मा का पतन करनेवाले हैं, 'कामः क्रोधस्तथा लोभः', काम, क्रोध और लोभ, 'तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्', इसलिए इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए। पिछले पन्द्रह श्लोकों में आसुरी स्वभाव का विस्तृत वर्णन था: दम्भ, अभिमान, अहंकार, द्वेष, क्रूरता। पर भगवान अब कहते हैं कि इन सबकी जड़ तीन हैं: काम, क्रोध और लोभ। जैसे एक विशाल वृक्ष की अनगिनत शाखाएँ हों, पर जड़ें केवल तीन। शाखाओं को काटते रहने से कुछ नहीं होगा; जड़ों को पहचानना होगा। 'द्वारम्', द्वार, यह उपमा बहुत सुन्दर है। नरक कोई दूर का स्थान नहीं; उसके द्वार हमारे भीतर ही हैं। जब भी हम काम, क्रोध या लोभ के वश में होते हैं, हम उस द्वार से भीतर पग रखते हैं। और ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं: काम पूरा न हो, तो क्रोध आता है; काम पूरा हो, तो लोभ बढ़ता है। जैसे एक त्रिकोण के तीन कोने। और 'त्यजेत्', त्याग देना चाहिए, यह बहुत स्पष्ट आदेश है, कोई सुझाव नहीं। यह श्लोक आपको एक सरल पर शक्तिशाली आत्म-निरीक्षण देता है। दिन के अन्त में स्वयं से पूछिए: आज मैं इन तीन द्वारों में से किससे सबसे अधिक बार होकर गया? अगले दिन उस द्वार पर विशेष पहरा बिठाइए।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
जब दुःख अनुभव हो, उसे मूल तक खोजो: क्या यह अपूर्ण इच्छा (काम) में जड़ है, अवरुद्ध इच्छा के क्रोध (क्रोध) में, या पर्याप्त न होने के भय (लोभ) में? मूल का नामकरण ही उससे मुक्ति का पहला कदम है। एक क्षण का ईमानदार आत्म-निरीक्षण इस चक्र को तोड़ सकता है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
आत्म-नियन्त्रण और आवेगों पर शोध में कुछ असंयमित व्यवहारों का सम्बन्ध व्यक्तिगत कठिनाइयों से देखा गया है, पर कारण अनेक होते हैं और निष्कर्ष हर व्यक्ति पर लागू नहीं होते। इच्छा, क्रोध और लोभ को हानिकारक व्यवहारों के प्रमुख कारण कहना बहुत व्यापक दावा होगा। 'त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम्' से सीमित साम्य यह है कि अनियंत्रित प्रवृत्तियाँ जीवन को कठिन बना सकती हैं। यह श्लोक का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक चेतावनी है।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.
- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
- Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
Found a mistake?