रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु
raso ’ham apsu kaunteya prabhāsmi śhaśhi-sūryayoḥ praṇavaḥ sarva-vedeṣhu śhabdaḥ khe pauruṣhaṁ nṛiṣhu
taste
I
in water
Arjun, the son of Kunti
the radiance
I am
of the moon and the sun
the sacred syllable Om
in all
Vedas
sound
in ether
ability
in humans
अर्थMeaning
हे कुन्तीनन्दन ! जलोंमें रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा (प्रकाश) मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार) मैं हूँ, आकाशमें शब्द और मनुष्योंमें पुरुषार्थ मैं हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
I am the taste in the waters, O Arjuna! I am the light in the sun and the moon; the sacred syllable Om in all the Vedas; sound in the ether; and manhood in men, I am.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
यहाँ से भगवान अपने को संसार के हर सार में दिखाना आरम्भ करते हैं, और यह वर्णन इतना सुंदर है कि हर साधारण अनुभव एक दिव्य दर्शन बन जाता है। 'रसोऽहमप्सु कौन्तेय', हे कुन्तीपुत्र, जल में रस मैं हूँ, 'प्रभास्मि शशिसूर्ययोः', चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश मैं हूँ, 'प्रणवः सर्ववेदेषु', सब वेदों में ओंकार मैं हूँ, 'शब्दः खे पौरुषं नृषु', आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषार्थ मैं हूँ। इस श्लोक में भगवान हर वस्तु के सबसे सारभूत गुण को अपना रूप बताते हैं। जल का सार उसका रस है, वह शीतलता और तृप्ति जो प्यास बुझाती है। सूर्य और चंद्रमा का सार उनका प्रकाश है। वेदों का सार ओंकार है, जिसमें सारा ज्ञान समाया है। और मनुष्य का सार उसका 'पौरुष', पुरुषार्थ, वह साहस और सामर्थ्य जो उसे कर्म करने की शक्ति देता है। यह श्लोक हमें एक अद्भुत साधना देता है: हर साधारण अनुभव में ईश्वर को पहचानना। अगली बार जब आप प्यास में जल पिएँ, तो उस तृप्ति के क्षण में उसे अनुभव कीजिए। जब सुबह सूर्य का प्रकाश आपके चेहरे पर पड़े, या रात में चाँदनी बिखरे, तो उसमें उसकी उपस्थिति को पहचानिए। ईश्वर को खोजने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं; वे उसी जल में हैं जो आप पीते हैं, उसी प्रकाश में जिसमें आप देखते हैं।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
“क्या आप ईश्वर को किसी दूर आकाश या मंदिर की सीमा में खोज रहे हैं, जबकि वह आपके पिए गए जल के रस में और आपके भीतर के पौरुष में साक्षात् उपस्थित है?”
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी
Panpsychism — रोजर पेनरोज़ जैसे अग्रणी भौतिकविदों और डेविड चामर्स जैसे दार्शनिकों द्वारा समर्थित सिद्धांत — प्रस्तावित करता है कि चेतना ब्रह्मांड का एक मूलभूत गुण हो सकती है, जो हर परमाणु में व्याप्त है। यह गीता की सर्वव्यापी दिव्यता की प्रतिध्वनि है।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
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- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-24
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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