श्रीमद्भगवद्गीता

Karma Yogaश्लोक 23/4353%

Bhagavad Gita 3.23

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 23–24) हे पार्थ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरताको करनेवाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

If I did not continue to work unweariedly, O Arjuna, people would follow my path.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

भगवान यहाँ बताते हैं कि वे कर्म क्यों करते रहते हैं, और उनका कारण अपने लिए नहीं, संसार के लिए है। 'यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः', यदि मैं कभी सावधान होकर, आलस्य-रहित होकर कर्म न करूँ, 'मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः', तो हे पार्थ, मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करेंगे। 'अतन्द्रितः', जो कभी तंद्रा में न पड़े, कभी आलसी न हो, यह शब्द भगवान के कर्म की एक सुंदर विशेषता बताता है। सूर्य कभी उदय होना नहीं भूलता, वायु कभी बहना नहीं छोड़ती, ऋतुएँ अपने समय पर आती हैं। यह सृष्टि का अतन्द्रित कर्म ही है जो संसार को चला रहा है। यदि वह एक क्षण के लिए भी रुक जाए, तो सब कुछ थम जाए। इस श्लोक में एक गहरा संदेश छिपा है: जिसे लोग आदर्श मानते हैं, उसका आलस्य भी एक उदाहरण बन जाता है। भगवान जैसे पूर्ण पुरुष भी इस बात के प्रति सजग हैं कि उनका आचरण दूसरों को क्या सिखा रहा है। यदि उन्हें भी यह सजगता रखनी है, तो हमें तो और अधिक रखनी चाहिए। आपके बच्चे, आपके सहकर्मी, आपके मित्र आपके 'वर्त्म', आपके मार्ग को देख रहे हैं। उन्हें अपने आचरण से वह मार्ग दिखाइए जिस पर आप उन्हें चलते देखना चाहते हैं।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-23
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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