प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते
prakṛiteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśhaḥ ahankāra-vimūḍhātmā kartāham iti manyate
of material nature
carried out
by the three modes
activities
all kinds of
those who are bewildered by the ego and misidentify themselves with the body
the doer
I
thus
thinks
अर्थMeaning
सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Actions are being performed in every way by the Gunas of Prakrti; he whose nature is deluded by egoism, however, thinks, 'I am the doer.'
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
यह श्लोक कर्तापन के अहंकार की जड़ को छूता है, और इसमें एक ऐसा सत्य है जो पहली बार सुनने पर चौंकाता है और फिर धीरे-धीरे मुक्त करता है। 'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः', सारे कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों के द्वारा किए जाते हैं; 'अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते', पर अहंकार से मोहित व्यक्ति मानता है कि 'मैं कर्ता हूँ'। इसे एक सरल अनुभव से समझिए। आप भोजन करते हैं, पर उसे पचाता कौन है? आप सोते हैं, पर आपकी श्वास कौन चलाता है? आपके विचार कहाँ से आते हैं, आपकी भावनाएँ कैसे उठती हैं? यदि ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि अधिकांश कर्म अपने आप हो रहे हैं: प्रकृति के, शरीर के, मन के नियमों से। फिर भी हम हर कर्म पर 'मैंने किया' की मुहर लगा देते हैं। यह 'मैं कर्ता हूँ' का भाव ही सफलता में अहंकार और असफलता में अपराधबोध, दोनों को जन्म देता है। जब यह भाव ढीला पड़ता है, तब मन हल्का हो जाता है: न सफलता का बोझ, न असफलता का। इसका अर्थ उत्तरदायित्व से भागना नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना है कि हम एक विशाल प्रक्रिया के माध्यम हैं, स्वामी नहीं। किसी उपलब्धि पर आज 'मैंने किया' के स्थान पर 'मेरे द्वारा हुआ' कहकर देखिए, और उस सूक्ष्म अंतर में मिलने वाली शांति को अनुभव कीजिए।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
अपनी सफलताओं पर अहंकार मत करो और असफलताओं से अपराध-बोध में मत जलो। तुम प्रकृति की विशाल ऊर्जा का केवल एक माध्यम हो। अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयास करो, पर यह मानकर कि ईश्वरीय व्यवस्था और प्रकृति ही वास्तविक संचालक है। जब कर्तापन का बोझ उतर जाता है, तो कर्म एक उत्सव और प्रार्थना बन जाता है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
कुछ मनोवैज्ञानिक प्रयोगों से संकेत मिलता है कि हमारे अनेक निर्णयों और कार्यों की प्रक्रिया सचेत विचार से पहले ही आरम्भ हो जाती है, और 'मैंने यह सोचकर किया' का बोध प्रायः बाद में बनता है। इन प्रयोगों की व्याख्या पर विद्वानों में गहरा मतभेद है। फिर भी यह विचार श्लोक से एक रोचक समानता रखता है कि कर्म प्रकृति के गुणों से होते हैं और अहंकार उन्हें अपना मान लेता है। यह श्लोक का प्रमाण नहीं, केवल एक संवाद है।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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