अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्
anādi-madhyāntam ananta-vīryam ananta-bāhuṁ śhaśhi-sūrya-netram paśhyāmi tvāṁ dīpta-hutāśha-vaktraṁ sva-tejasā viśhvam idaṁ tapantam
अर्थMeaning
आपको मैं आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओंवाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोवाले, प्रज्वलित अग्निके समान मुखोंवाले और अपने तेजसे संसारको संतप्त करते हुए देख रहा हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
I behold You as having no beginning, middle, or end; Your might is infinite. You are endowed with an innumerable number of arms. The sun and moon are Your eyes, and Your mouth emits burning fire. With Your own radiance, You are warning the entire universe.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अर्जुन का वर्णन अब और गहरा, और तेज और प्रचण्ड होता जाता है। 'अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम्', आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त सामर्थ्यवाले, 'अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्', अनन्त भुजाओंवाले, चन्द्रमा और सूर्य रूपी नेत्रोंवाले, 'पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्', प्रज्वलित अग्नि के समान मुखवाले, 'स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्', और अपने तेज से इस विश्व को तपाते हुए आपको मैं देख रहा हूँ। 'शशिसूर्यनेत्रम्', चन्द्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं, यह उपमा अद्भुत है। जिन्हें हम आकाश में दो अलग-अलग ज्योतियों के रूप में देखते हैं, वे भगवान के दो नेत्र हैं। एक नेत्र दिन में तेज से देखता है, दूसरा रात में शीतलता से। पूरा संसार हर क्षण उनकी दृष्टि में है: दिन में भी, रात में भी। पर इस श्लोक में एक नया भाव भी प्रवेश करता है, जो आगे और प्रबल होगा। 'दीप्तहुताशवक्त्रम्', जलती अग्नि जैसे मुख; 'तपन्तम्', संसार को तपाते हुए। अब तक विराट रूप का सौन्दर्य और महिमा थी, पर अब उसमें एक भयावहता झलकने लगी है। यह वह तेज है जो केवल प्रकाश ही नहीं देता, जलाता भी है। अर्जुन का विस्मय धीरे-धीरे भय की ओर मुड़ रहा है। यह श्लोक आपको भगवान के उस पक्ष के लिए तैयार करता है जिसे हम प्रायः भूल जाते हैं। वे केवल कोमल नहीं, प्रचण्ड भी हैं। सूर्य जो जीवन देता है, वही ग्रीष्म में तपाता भी है। दोनों रूपों को एक ही प्रेम से स्वीकार करना ही परिपक्व भक्ति है।
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-24
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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