श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 36/5565%

Bhagavad Gita 11.36

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अर्जुन उवाचस्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्याजगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्तिसर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

अर्जुन बोले -- हे अन्तर्यामी भगवन् ! आपके नाम, गुण, लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुराग(-प्रेम-) को प्राप्त हो रहा है। आपके नाम, गुण आदिके कीर्तनसे भयभीत होकर राक्षसलोग दसों दिशाओंमें भागते हुए जा रहे हैं और सम्पूर्ण सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं। यह सब होना उचित ही है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Arjuna said, Rightly it is, O Krsna, that Your praise should move the world to joy and love. The rakshasas flee in fear on all sides, and all the hosts of siddhas bow down to You.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

काँपते हुए भी अर्जुन अब स्तुति आरम्भ करता है, और उसके पहले ही शब्द में एक नई स्थिरता आ गई है। 'स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या', हे हृषीकेश, यह उचित ही है कि आपके नाम-गुण के कीर्तन से, 'जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च', सारा जगत् हर्षित होता है और प्रेम से भर जाता है; 'रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति', राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं, 'सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः', और सिद्धों के सब समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं। 'स्थाने', उचित ही है, यह शब्द अर्जुन की बदली हुई दृष्टि को प्रकट करता है। अभी तक वह भयभीत था और पूछ रहा था कि आप कौन हैं। अब वह समझ गया है, और कहता है कि जो कुछ हो रहा है, वह उचित ही है। काल का उग्र रूप भी धर्म की व्यवस्था का अंग है। इस श्लोक में एक ही कीर्तन के दो भिन्न प्रभाव हैं, और यह भेद बहुत सुन्दर है। भगवान के नाम से जगत् हर्षित होता है और प्रेम से भर जाता है; पर उसी नाम से राक्षस भयभीत होकर भागते हैं। एक ही सूर्य से कमल खिलता है और उल्लू छिप जाता है। जो प्रकाश को प्रेम करता है, उसके लिए भगवान का नाम आनन्द है; जो अन्धकार में जीता है, उसके लिए वही नाम भय है। अन्तर नाम में नहीं, सुननेवाले के हृदय में है। यह श्लोक आपसे पूछता है: जब आप भगवान का नाम सुनते हैं, तो आपके भीतर क्या जागता है? प्रतिदिन नाम-कीर्तन का अभ्यास कीजिए, जब तक वह आपके लिए केवल आनन्द न बन जाए।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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