श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 30/5555%

Bhagavad Gita 11.30

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

आप अपने प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए उन्हें चारों ओरसे बार-बार चाट रहे हैं और हे विष्णो ! आपका उग्र प्रकाश अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत् को परिपूर्ण करके सबको तपा रहा है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Devouring all the worlds on every side with your flaming mouths, you lick them up. Your fiery rays, filling the whole universe with their radiance, scorch it, O Vishnu.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

विराट रूप का प्रलयकारी पक्ष यहाँ अपनी पराकाष्ठा पर है। 'लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात्', आप चारों ओर से ग्रसते हुए बार-बार चाट रहे हैं, 'लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः', सम्पूर्ण लोकों को अपने प्रज्वलित मुखों से; 'तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रम्', अपने तेज से सम्पूर्ण जगत् को भरकर, 'भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो', हे विष्णो, आपका उग्र प्रकाश सबको तपा रहा है। 'लेलिह्यसे', बार-बार चाटना, यह शब्द एक भयानक चित्र खींचता है, जैसे अग्नि की लपटें किसी वस्तु को चारों ओर से घेरकर बार-बार छूती हैं, जब तक वह पूरी भस्म न हो जाए। यह काल का वह रूप है जो किसी को नहीं छोड़ता, जो धीरे-धीरे सब कुछ अपने में समेट लेता है। फिर भी, इस भयावहता के बीच अर्जुन उन्हें 'विष्णो' कहकर पुकारता है, और यह पुकार बहुत अर्थपूर्ण है। विष्णु पालनकर्ता हैं, रक्षक हैं। जो सबको ग्रस रहे हैं, वही सबके रक्षक भी हैं। यह विरोधाभास भगवान के स्वभाव की पूर्णता है: जो सृष्टि करते हैं, वही पालन करते हैं, और वही संहार भी। संहार भी नई सृष्टि के लिए होता है, जैसे पतझड़ वसन्त के लिए। 'तेजोभिरापूर्य', तेज से भरकर, यह बताता है कि जो जल रहा है, वह भी उसी प्रकाश में डूबा हुआ है। यह श्लोक आपको एक कठिन सत्य को स्वीकार करना सिखाता है। जीवन में जो कुछ छिन जाता है, वह भी उसी भगवान के हाथ से जाता है जिसने वह दिया था। उस हाथ पर विश्वास रखिए।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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