श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 21/5538%

Bhagavad Gita 11.21

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अमी हि त्वां सुरसङ्घाः विशन्तिकेचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाःस्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

वे ही देवताओंके समुदाय आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कई तो भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नामों और गुणोंका कीर्तन कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धोंके समुदाय 'कल्याण हो ! मङ्गल हो !' ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रोंके द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Verily, the hosts of Devas enter into You. Some, in fear, extol You with clasped hands, crying "Hail!" The bands of great seers and Siddhas praise You with meaningful hymns.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अर्जुन अब देखता है कि देवता और ऋषि इस विराट रूप के सामने क्या कर रहे हैं, और यह दृश्य भय और भक्ति, दोनों से भरा है। 'अमी हि त्वां सुरसङ्घाः विशन्ति', ये देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं, 'केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति', उनमें से कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपका गुणगान कर रहे हैं; 'स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः', महर्षियों और सिद्धों के समूह 'कल्याण हो' कहकर, 'स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः', उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति कर रहे हैं। इस श्लोक में दो प्रकार की प्रतिक्रियाएँ हैं, और उनका भेद बहुत सुन्दर है। एक ओर देवता हैं, जो 'भीताः', भयभीत हैं, और हाथ जोड़कर नाम-गुण का कीर्तन कर रहे हैं। उनकी स्तुति में भय का स्वर है। दूसरी ओर महर्षि और सिद्ध हैं, जो 'स्वस्ति', कल्याण हो, कहकर स्तुति कर रहे हैं। उनकी स्तुति में भय नहीं, शान्ति है। यह भेद क्यों? क्योंकि महर्षि और सिद्ध जानते हैं कि यह उग्र रूप भी कल्याणकारी है। जो भगवान के तत्त्व को जानता है, वह उनके प्रचण्ड रूप में भी मंगल ही देखता है। जैसे एक अनुभवी नाविक प्रचण्ड आँधी में भी शान्त रहता है, क्योंकि वह समुद्र को जानता है। 'स्वस्ति' शब्द उस विश्वास की अभिव्यक्ति है कि जो कुछ हो रहा है, वह अन्ततः कल्याण के लिए है। यह श्लोक आपसे पूछता है: जब जीवन में कोई कठिन, भयावह परिस्थिति आए, तो आपकी प्रार्थना किस स्वर में होती है, भय के या विश्वास के? महर्षियों की भाँति कठिन क्षण में भी 'स्वस्ति' कहना सीखिए।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive
  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-22
Licence note (as recorded)
Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

Found a mistake?

आगे क्या · What next

समानांतर संदर्भ व श्लोक (Cross-Scriptural Parallels)

इसी दार्शनिक तत्त्व पर अन्य वैदिक ग्रंथों और उपनिषदों के प्रेरक संदर्भ

BhaktiBhagavad Gita 9.26
श्लोक देखें

"Whoever offers Me a leaf, a flower, fruit, or water with devotion — I accept that loving offering."

BhaktiBhagavad Gita 18.65
श्लोक देखें

"Fix your mind on Me, be devoted to Me, worship Me, bow to Me — thus you shall come to Me alone, this I promise."

BhaktiBhagavad Gita 12.8
श्लोक देखें

"Fix your mind on Me alone, rest your intellect in Me — thus you shall dwell in Me hereafter."