श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 32/5558%

Bhagavad Gita 11.32

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

श्री भगवानुवाचकालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वेयेऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

श्रीभगवान् बोले -- मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय मैं इन सब लोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ। तुम्हारे प्रतिपक्षमें जो योद्धालोग खड़े हैं, वे सब तुम्हारे युद्ध किये बिना भी नहीं रहेंगे।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The Lord said, "I am the world-destroying Time. Manifesting myself fully, I have begun to destroy the worlds here. Even without you, none of the warriors arrayed in the hostile ranks will survive."

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अर्जुन के प्रश्न का उत्तर भगवान एक ऐसे वचन से देते हैं जो गीता के सबसे गम्भीर वचनों में से एक है। 'कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धः', मैं लोकों का क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ, 'लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः', और इस समय इन लोगों का संहार करने के लिए यहाँ प्रवृत्त हुआ हूँ; 'ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे', तुम्हारे बिना भी ये सब नहीं रहेंगे, 'येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः', जो योद्धा विरोधी सेनाओं में खड़े हैं। 'कालोऽस्मि', मैं काल हूँ, यह उत्तर अर्जुन के 'को भवान्', आप कौन हैं, का सीधा उत्तर है। भगवान कहते हैं कि यह उग्र रूप काल का है, समय का, जो सब कुछ नष्ट करता है। हर प्राणी, हर साम्राज्य, हर सभ्यता अन्ततः काल के हाथों समाप्त होती है। पर इस श्लोक का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है दूसरी पंक्ति: 'ऋतेऽपि त्वाम्', तुम्हारे बिना भी। अर्जुन सोच रहा था कि यदि वह युद्ध न करे, तो ये लोग बच जाएँगे, और उनकी मृत्यु का पाप उस पर नहीं आएगा। भगवान उसके इस भ्रम को तोड़ देते हैं: इनका अन्त निश्चित है, चाहे तुम लड़ो या न लड़ो। यह किसी हिंसा को उचित ठहराने का वचन नहीं; यह उस अहंकार को तोड़ने का वचन है जो मानता है कि सब कुछ मेरे हाथ में है। यह श्लोक आपको सिखाता है कि आप संसार के कर्ता नहीं हैं। परिणाम काल के हाथ में हैं; आपके हाथ में केवल यह है कि आप अपना कर्तव्य धर्म के अनुसार करें या नहीं।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive
  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

Found a mistake?

संबंधित ज्ञानRelated wisdom

ये दर्ज संबंध हैं। अपने आप सुझाए हुए पाठ नहीं।

आगे क्या · What next