मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव
mat-karma-kṛin mat-paramo mad-bhaktaḥ saṅga-varjitaḥ nirvairaḥ sarva-bhūteṣhu yaḥ sa mām eti pāṇḍava
perform duties for my sake
considering me the Supreme
devoted to me
free from attachment
without malice
toward all entities
who
he
to me
comes
Arjun, the son of Pandu
अर्थMeaning
हे पाण्डवन ! जो मेरे लिये ही कर्म करनेवाला, मेरे ही परायण और मेरा ही भक्त है तथा सर्वथा आसक्तिरहित और प्राणिमात्रके साथ निर्वैर है, वह भक्त मेरेको प्राप्त होता है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Whoever works for Me, regards Me as the highest and is devoted to Me, free from attachment and without animosity towards any creature, they come to Me, O Arjuna.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
विश्वरूपदर्शन का यह महान अध्याय एक ऐसे श्लोक पर समाप्त होता है जिसे परम्परा में गीता का सार भी कहा गया है। 'मत्कर्मकृन्मत्परमः', जो मेरे लिए कर्म करता है, जिसका परम लक्ष्य मैं हूँ, 'मद्भक्तः सङ्गवर्जितः', जो मेरा भक्त है और आसक्ति से रहित है, 'निर्वैरः सर्वभूतेषु', जिसका किसी भी प्राणी से वैर नहीं, 'यः स मामेति पाण्डव', हे पाण्डव, वह मुझे प्राप्त होता है। सोचिए, इस अध्याय में अर्जुन ने भगवान का सबसे विराट, सबसे भयावह रूप देखा: वह काल जो सबको ग्रसता है। और अध्याय का अन्त किस शब्द पर होता है? 'निर्वैरः सर्वभूतेषु', किसी भी प्राणी से वैर नहीं। यह विरोधाभास नहीं, एक गहरा सन्देश है। जिसने देख लिया कि सब एक ही भगवान के शरीर में हैं, वह किसी से वैर कैसे रख सकता है? यह श्लोक भक्त के पाँच लक्षण देता है, और वे एक पूर्ण जीवन का चित्र बनाते हैं। कर्म भगवान के लिए; लक्ष्य भगवान; प्रेम भगवान से; संसार में आसक्ति नहीं; और सब प्राणियों से वैर नहीं। ध्यान दीजिए कि अर्जुन युद्ध करने जा रहा है, फिर भी उसे 'निर्वैर' रहने को कहा जा रहा है। कर्तव्य निभाना और वैर रखना, ये दो अलग बातें हैं। धर्म के लिए खड़े होने में भी हृदय में घृणा नहीं होनी चाहिए। यह श्लोक आपके लिए एक दैनिक दर्पण बन सकता है। प्रतिदिन इन पाँच लक्षणों से अपना जीवन मिलाइए, और विशेष रूप से देखिए: क्या आपके हृदय में किसी के प्रति वैर बचा है? उसे भगवान को सौंप दीजिए।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-24
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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