अर्जुन उवाचदृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन।इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः
arjuna uvācha dṛiṣhṭvedaṁ mānuṣhaṁ rūpaṁ tava saumyaṁ janārdana idānīm asmi saṁvṛittaḥ sa-chetāḥ prakṛitiṁ gataḥ
Arjun said
seeing
this
human
form
your
gentle
he who looks after the public, Krishna
now
I am
composed
in my mind
to normality
have become
अर्थMeaning
अर्जुन बोले -- हे जनार्दन ! आपके इस सौम्य मनुष्यरूपको देखकर मैं इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Arjuna said, "Having beheld Your human and pleasing form, O Krsna, I am now composed in mind and have been restored to my normal nature."
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
सौम्य रूप को देखकर अर्जुन के हृदय में जो शान्ति उतरती है, वह इस श्लोक में झलकती है। 'दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन', हे जनार्दन, आपके इस सौम्य मनुष्य रूप को देखकर, 'इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः', अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ, 'प्रकृतिं गतः', और अपनी स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त हो गया हूँ। इस श्लोक में एक गहरी राहत की साँस है। 'सचेताः', सचेत, चित्त सहित, यह शब्द बताता है कि विराट रूप के दर्शन के समय अर्जुन का चित्त मानो उसके वश में नहीं था। भय, विस्मय, व्याकुलता, सबने उसे घेर लिया था। अब उसका चित्त लौट आया है, जैसे कोई उफनते समुद्र में डूबते-उतराते हुए अचानक तट पर पहुँच जाए। 'प्रकृतिं गतः', अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आया, यह शब्द बहुत मानवीय है। अर्जुन एक मनुष्य है, और मनुष्य का हृदय अनन्त को सहने के लिए नहीं बना। उसे एक ऐसे भगवान की आवश्यकता है जिसे वह देख सके, जिससे बात कर सके, जिसके साथ बैठ सके। 'मानुषं रूपम्', मनुष्य रूप, यही वह रूप है जिसमें भगवान मनुष्य के सबसे निकट होते हैं। और 'जनार्दन', जो लोगों के कष्ट हरते हैं, यह सम्बोधन बताता है कि अर्जुन का कष्ट अब दूर हो गया है। यह श्लोक आपको बताता है कि भगवान का मनुष्य रूप उनका सबसे बड़ा उपहार है। उसमें वे हमारे जितने निकट आते हैं, उतना कोई विराट रूप नहीं आ सकता। उनके उस रूप से प्रेम कीजिए जो आपके हृदय को 'प्रकृति', स्वाभाविक शान्ति, में लौटा दे।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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