क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम
kṣhetra-jñaṁ chāpi māṁ viddhi sarva-kṣhetreṣhu bhārata kṣhetra-kṣhetrajñayor jñānaṁ yat taj jñānaṁ mataṁ mama
the knower of the field
also
only
me
know
all
in individual fields of activities
scion of Bharat
the field of activities
of the knower of the field
understanding of
which
that
knowledge
opinion
my
अर्थMeaning
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! तू सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ मेरेको ही समझ; और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतमें ज्ञान है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
And know Me also as the Knower of all Fields, O Arjuna. In My view, the knowledge of the Field and its Knower is the true knowledge.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की परिभाषा देने के बाद भगवान एक ऐसा वचन कहते हैं जो इस भेद को एक दिव्य ऊँचाई पर ले जाता है। 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत', हे भारत, सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो; 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम', और क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में ज्ञान है। 'सर्वक्षेत्रेषु', सब क्षेत्रों में, यह शब्द इस श्लोक का हृदय है। हर शरीर एक खेत है, और हर खेत में जाननेवाला वही एक है। आपके शरीर में जो जान रहा है, और किसी दूसरे के शरीर में जो जान रहा है, वह अन्ततः एक ही चेतना है। जैसे एक ही सूर्य असंख्य जलपात्रों में प्रतिबिम्बित होता है; पात्र अलग-अलग हैं, सूर्य एक है। परम्परा में इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टियों से पढ़ा गया है। अद्वैत के आचार्यों ने इसमें जीव और ब्रह्म की एकता देखी है; भक्ति के आचार्यों ने इसमें यह देखा है कि हर जीव के भीतर भगवान अन्तर्यामी रूप से विराजमान हैं। दोनों दृष्टियों में एक बात समान है: जो सबमें जाननेवाला है, वह भगवान से अलग नहीं। और भगवान कहते हैं कि यही 'ज्ञान' है। शेष सारी जानकारी, सारी विद्याएँ, इसके सामने गौण हैं। यह श्लोक आपकी दृष्टि बदल सकता है। जब किसी दूसरे व्यक्ति को देखें, तो स्मरण कीजिए कि उसके भीतर भी वही जाननेवाला बैठा है जो आपके भीतर है।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
जब तुम कहते हो "मेरा मन व्याकुल है" या "मेरा शरीर थका है" — ध्यान दो: यह "मेरा" कौन है? एक साक्षी है जो व्याकुलता और थकान को देखता है। वही क्षेत्रज्ञ है। व्याकुल मन या थके शरीर बनने के बजाय उस साक्षी-पहचान में टिकने का अभ्यास करो।
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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