अर्जुन उवाचप्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव
arjuna uvācha prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva kṣhetraṁ kṣhetra-jñam eva cha etad veditum ichchhāmi jñānaṁ jñeyaṁ cha keśhava
Arjun said
material nature
the enjoyer
and
indeed
the field of activities
the knower of the field
even
also
this
to know
I wish
knowledge
the goal of knowledge
and
Krishna, the killer of the demon named Keshi
अर्थMeaning
अर्जुन बोले — हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष को, तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को, एवं ज्ञान और ज्ञेय को तत्त्व से जानना चाहता हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Arjuna said: O Keshava, I wish to know about Prakriti (nature) and Purusha (the spirit), as well as the Kshetra (field of activities) and Kshetrajna (knower of the field), and also knowledge and that which is to be known.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
तेरहवाँ अध्याय, 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग', गीता के तीसरे षट्क का आरम्भ है, जहाँ भक्ति के मधुर रस के बाद ज्ञान का गम्भीर विवेचन आरम्भ होता है। अर्जुन छह गहरे तत्त्वों को एक साथ जानना चाहता है। 'प्रकृतिं पुरुषं चैव', प्रकृति और पुरुष को, 'क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च', क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को, 'एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव', और हे केशव, ज्ञान और ज्ञेय को मैं जानना चाहता हूँ। इन छह शब्दों में भारतीय दर्शन के सबसे गहरे प्रश्न समाए हैं। मैं कौन हूँ, और यह शरीर क्या है? जो देखता है, वह कौन है, और जो देखा जाता है, वह क्या है? सच्चा ज्ञान क्या है, और जानने योग्य क्या है? ये प्रश्न किसी पुस्तक के नहीं, हर विचारशील मनुष्य के हृदय के हैं। परम्परा में ध्यान दिलाया गया है कि कुछ प्राचीन पाठों में यह श्लोक नहीं मिलता, और अध्याय सीधे भगवान के वचन से आरम्भ होता है। जिन संस्करणों में यह है, वहाँ यह अध्याय को एक सुन्दर भूमिका देता है: अर्जुन अब केवल युद्ध के धर्म के विषय में नहीं, अपने अस्तित्व के मूल के विषय में पूछ रहा है। भक्तियोग में उसने जाना कि भगवान से प्रेम कैसे करें; अब वह जानना चाहता है कि वह स्वयं कौन है, जो प्रेम करता है। यह श्लोक आपको भी यही प्रश्न पूछने का आमंत्रण देता है। कुछ क्षण रुककर अपने-आप से पूछिए: यह शरीर, यह मन, इनके पीछे जो देख रहा है, वह कौन है?
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
जीवन में अपनी पहचान को अपने अनुभवों (सुख-दुःख, पद, बीमारी, सफलता-विफलता) से अलग करना सीखो। शरीर और मन तुम्हारा साधन (क्षेत्र) हैं, तुम स्वयं वह अमर ज्ञाता (क्षेत्रज्ञ) हो। जब भी मन में तनाव या चिंता उठे, स्वयं को स्मरण कराओ: "यह अनुभव मेरे भीतर घट रहा है, पर मैं यह अनुभव नहीं हूँ — मैं इसका शांत साक्षी हूँ।" यह विवेक तुरंत मानसिक शांति और स्वाधीनता प्रदान करता है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
चेतना-विज्ञान में यह प्रश्न खुला और विवादित है कि प्रथम-पुरुष अनुभव का सम्बन्ध मस्तिष्क की प्रक्रियाओं से कैसे समझा जाए। अनुभवों का बाहरी वर्णन और उन्हें भीतर से जीने का बोध अलग प्रश्नों की तरह चर्चा में आते हैं; इससे यह सिद्ध नहीं होता कि कोई स्वतंत्र ज्ञाता वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद इस दार्शनिक प्रश्न से संवाद कर सकता है, पर समानता मात्र है, श्लोक का प्रमाण नहीं।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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