श्रीमद्भगवद्गीता

Dhyana Yogaश्लोक 41/4787%

Bhagavad Gita 6.41

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

वह योगभ्रष्ट पुण्यकर्म करनेवालोंके लोकोंको प्राप्त होकर और वहाँ बहुत वर्षोंतक रहकर फिर यहाँ शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He who has fallen away from Yoga is born again in the house of the pure and prosperous, having attained to the worlds of doers of good deeds and dwelled there for many long years.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

भगवान अब विस्तार से बताते हैं कि उस अधूरे साधक का आगे क्या होता है, और यह वर्णन एक बहुत सुंदर, बहुत आशापूर्ण यात्रा का चित्र है। 'प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः', वह योगभ्रष्ट पुण्य करने वालों के लोकों को प्राप्त होकर, वहाँ बहुत वर्षों तक रहकर, 'शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते', फिर पवित्र और समृद्ध लोगों के घर में जन्म लेता है। इस श्लोक में एक अद्भुत करुणा है। भगवान बताते हैं कि अधूरे साधक को दंड नहीं मिलता; उसे पहले विश्राम मिलता है, पुण्यलोकों में, जहाँ उसके किए हुए शुभ कर्मों का फल वह भोगता है। फिर वह एक ऐसे घर में जन्म लेता है जहाँ उसकी साधना फिर से आरम्भ हो सके: 'शुचीनाम्', पवित्र आचरण वाले, और 'श्रीमताम्', समृद्ध, जहाँ जीविका की चिंता उसे साधना से न रोके। यह श्लोक हमें बताता है कि आध्यात्मिक प्रगति कभी शून्य से आरम्भ नहीं होती। जो कुछ एक जन्म में बोया, वह अगले जन्म में उगता है। अनुकूल परिस्थितियाँ, अच्छे संस्कार देने वाला परिवार, ये सब पूर्व प्रयत्नों का फल हो सकते हैं। यदि आपको जीवन में साधना के लिए अनुकूल वातावरण मिला है, तो उसे एक अवसर के रूप में देखिए, जिसे आपकी अपनी पुरानी यात्रा ने आपके लिए तैयार किया है। उस अवसर को व्यर्थ न जाने दीजिए।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-23
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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