यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्
yato yato niśhcharati manaśh chañchalam asthiram tatas tato niyamyaitad ātmanyeva vaśhaṁ nayet
From whatever direction the restless and unsteady mind wanders, bring it gently back under the control of the Self.whenever and wherever
wanders
the mind
restless
unsteady
from there
having restrained
this
on God
certainly
control
should bring
अर्थMeaning
यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Wherever the fickle and unsteady mind wanders, one should subdue it and then bring it back under the control of the self alone.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
यह श्लोक हर ध्यान करने वाले के लिए सबसे व्यावहारिक और सबसे करुणामय निर्देश है, क्योंकि यह उस सत्य को स्वीकार करता है जिसे हर साधक अनुभव करता है: मन भटकता है। 'यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्', यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भी भटके, 'ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्', वहाँ-वहाँ से उसे हटाकर फिर आत्मा में ही लगाए। इस श्लोक में भगवान यह नहीं कहते कि मन भटकना नहीं चाहिए; वे मानते हैं कि वह भटकेगा। 'यतो यतो', जहाँ-जहाँ भी, यह दोहराव बताता है कि मन बार-बार, अनगिनत दिशाओं में जाएगा। ध्यान की असफलता मन का भटकना नहीं है; असफलता है उसे वापस न लाना। हर बार जब आप पहचानते हैं कि मन भटक गया, और उसे धीरे से वापस लाते हैं, वही क्षण ध्यान का सच्चा अभ्यास है। इस अभ्यास में एक कोमलता आवश्यक है। जैसे एक माँ अपने भटकते बालक को डाँटकर नहीं, प्रेम से वापस बुलाती है, वैसे ही मन को भी बिना क्रोध के, बिना निराशा के, लौटाना है। यदि आप हर बार भटकने पर स्वयं पर क्रोध करेंगे, तो वह क्रोध स्वयं एक नई हलचल बन जाएगा। आज ध्यान में जितनी बार भी मन भटके, उसे बिना किसी शिकायत के, धैर्य से वापस लाइए। हर वापसी मन की एक मांसपेशी को सशक्त करती है।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
जब ध्यान या काम के दौरान मन भटके, तो स्वयं को दोष मत दीजिए और न ही निराश होइए। भटकाव को पहचानना ही आपकी पहली जीत है। अत्यंत प्रेम और धैर्य से मन को वापस अपने कार्य या श्वास पर ले आइए। यह बार-बार का लौटना ही वह वास्तविक अभ्यास है जो आपके चरित्र और इच्छाशक्ति को फौलाद बनाता है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
ध्यान में मन भटकना सामान्य है। अभ्यास की एक उपयोगी प्रक्रिया है: भटकाव का ध्यान होना, फिर चुने हुए विषय पर लौटना। कुछ शोध इस तरह के प्रशिक्षण और ध्यान-नियमन के बीच सम्बन्ध का संकेत देते हैं, पर परिणाम सभी अभ्यासों और लोगों में समान नहीं। 'यतो यतो निश्चरति' का निर्देश इससे एक सीमित साम्य रखता है। इससे यह समझ आता है कि लौटना अभ्यास का अंग है, पर यह समानता श्लोक का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
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- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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