श्रीमद्भगवद्गीता

Arjuna Visada Yogaश्लोक 14/4730%

Bhagavad Gita 1.14

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

उसके बाद सफेद घोड़ों से युक्त महान् रथ पर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Then Sri Krishna and Arjuna, stationed in their great chariot yoked with white horses, blew their divine conchs.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

कौरव-सेना के प्रचण्ड कोलाहल के बाद संजय पाण्डव-पक्ष का वर्णन करते हैं, और उनका स्वर अचानक बदल जाता है। 'ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते', उसके बाद श्वेत घोड़ों से युक्त, 'महति स्यन्दने स्थितौ', महान रथ पर बैठे हुए, 'माधवः पाण्डवश्चैव', माधव, अर्थात् श्रीकृष्ण, और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने, 'दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः', दिव्य शंखों को बजाया। इस श्लोक में संजय का वर्णन कितना भिन्न है! कौरव-सेना के लिए उन्होंने 'तुमुल', भयंकर कोलाहल कहा था, जिसमें अनेक वाद्य बिना किसी व्यवस्था के बज उठे। पर पाण्डव-पक्ष का वर्णन वे एक दिव्य दृश्य से आरम्भ करते हैं: श्वेत घोड़ों से जुता हुआ एक महान रथ, और उस पर दो व्यक्ति, भगवान और उनके भक्त, एक साथ अपने दिव्य शंख बजाते हुए। 'श्वेतैर्हयैः', श्वेत घोड़े, यह रंग पवित्रता और सात्त्विकता का प्रतीक है। और 'दिव्यौ', दिव्य, यह शब्द बताता है कि ये शंख साधारण नहीं, देवताओं से प्राप्त थे। संजय, जो स्वयं धृतराष्ट्र के मन्त्री हैं, अनजाने में ही यह संकेत दे रहे हैं कि धर्म किस पक्ष में है। 'माधवः', लक्ष्मीपति, यह नाम बताता है कि जिस पक्ष में लक्ष्मी के स्वामी स्वयं हैं, उस पक्ष की विजय निश्चित है। यह श्लोक आपको एक सुन्दर चित्र देता है: भगवान और भक्त एक ही रथ पर। आप भी अपने जीवन के रथ पर भगवान को साथ बिठाइए, फिर कोई भी युद्ध भयावह नहीं रहेगा।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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