धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः
dhṛiṣhṭaketuśhchekitānaḥ kāśhirājaśhcha vīryavān purujit kuntibhojaśhcha śhaibyaśhcha nara-puṅgavaḥ yudhāmanyuśhcha vikrānta uttamaujāśhcha vīryavān
Dhrishtaketu
Chekitan
Kashiraj
and
heroic
Purujit
Kuntibhoj
and
Shaibya
and
best of men
Yudhamanyu
and
courageous
Uttamauja
and
gallant
अर्थMeaning
(श्लोक 4–6) यहाँ (पाण्डवों की सेना में) बड़े-बड़े शूरवीर हैं, जिनके बहुत बड़े-बड़े धनुष हैं तथा जो युद्ध में भीम और अर्जुनके समान हैं। उनमें युयुधान (सात्यकि), राजा विराट और महारथी द्रुपद भी हैं। धृष्टकेतु और चेकितान तथा पराक्रमी काशिराज भी हैं। पुरुजित् और कुन्तिभोज--ये दोनों भाई तथा मनुष्योंमें श्रेष्ठ शैब्य भी हैं। पराक्रमी युधामन्यु और पराक्रमी उत्तमौजा भी हैं। सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र भी हैं। ये सब-के-सब महारथी हैं।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Dhrstaketu, Cekitana, the valiant king of Kasi, Purujit, Kuntibhoja, and Saibya, the best among men;
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
पाण्डव-सेना के वीरों की सूची आगे बढ़ती है। 'धृष्टकेतुश्चेकितानः', धृष्टकेतु और चेकितान, 'काशिराजश्च वीर्यवान्', और पराक्रमी काशिराज, 'पुरुजित्कुन्तिभोजश्च', पुरुजित् और कुन्तिभोज, 'शैब्यश्च नरपुङ्गवः', और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य। पहली दृष्टि में यह केवल नामों की एक सूची लगती है, पर इनमें से हर नाम एक कथा लिए हुए है। कुन्तिभोज वे हैं जिन्होंने माता कुन्ती को गोद लिया था, अर्थात् वे पाण्डवों के नाना जैसे थे। धृष्टकेतु शिशुपाल के पुत्र थे, फिर भी वे पाण्डवों के पक्ष में खड़े थे। काशिराज और शैब्य दूर-दूर के राज्यों से आए थे। इस सूची में एक बात ध्यान देने योग्य है: दुर्योधन इन सबको 'वीर्यवान्', पराक्रमी, और 'नरपुङ्गवः', मनुष्यों में श्रेष्ठ, कहकर सम्मान देता है। वह अपने शत्रुओं की वीरता को स्वीकार करने से नहीं हिचकता। यह उसके मन का एक सत्य पक्ष है, पर इसके पीछे का भाव भय है, आदर नहीं। वह इन नामों को गिनाकर मानो स्वयं को और गुरु को यह बताना चाहता है कि सामने की सेना कितनी भयावह है। यह श्लोक हमें बताता है कि महाभारत का युद्ध केवल दो परिवारों का नहीं, पूरे भारतवर्ष का युद्ध था, जिसमें दूर-दूर के राजा अपने सम्बन्धों और धर्म के अनुसार पक्ष चुनकर आए थे। आप भी जीवन में जिस पक्ष के साथ खड़े हों, सम्बन्ध और धर्म देखकर खड़े हों, केवल लाभ देखकर नहीं।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-24
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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