सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते
sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati vepathuśh cha śharīre me roma-harṣhaśh cha jāyate
quivering
my
limbs
mouth
and
is drying up
shuddering
and
on the body
my
standing of bodily hair on end
also
is happening
अर्थMeaning
(श्लोक 28–30) अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
My limbs have weakened, my mouth has become parched, my body is trembling, and my hairs are standing on end.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अर्जुन की पीड़ा अब उसके शरीर में प्रकट होने लगती है, और वह उसका एक सजीव, मार्मिक वर्णन करता है। 'सीदन्ति मम गात्राणि', मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, 'मुखं च परिशुष्यति', मुख सूख रहा है, 'वेपथुश्च शरीरे मे', मेरे शरीर में कम्पन हो रहा है, 'रोमहर्षश्च जायते', और रोंगटे खड़े हो रहे हैं। सोचिए, यह कौन बोल रहा है? अर्जुन, जिसने अकेले पूरी कौरव-सेना को विराट नगर में पराजित किया था। जिसने भगवान शिव से युद्ध किया था। जिसका नाम सुनकर शत्रु काँपते थे। वही अर्जुन आज कह रहा है कि मेरे अंग ढीले पड़ रहे हैं, मेरा मुख सूख रहा है, मेरा शरीर काँप रहा है। यह किसी कायर का वर्णन नहीं; यह एक वीर के हृदय के टूटने का वर्णन है। इस श्लोक में शरीर और मन का गहरा सम्बन्ध दिखता है। जब मन पर कोई भारी भावना आती है, तो शरीर तुरन्त उसे प्रकट कर देता है। आज का विज्ञान भी इसे मानता है: तीव्र भावनात्मक संकट में शरीर में कम्पन, मुख सूखना, अंगों का शिथिल होना स्वाभाविक है। अर्जुन का मन अब उसके शरीर पर अधिकार कर चुका है। यह श्लोक उस भावनात्मक संकट को पहचानना सिखाता है जो हम सबके जीवन में कभी न कभी आता है। जब आप कभी ऐसी अवस्था में हों, जब शरीर काँपे और मन डूबे, तो स्मरण कीजिए कि अर्जुन भी इस अवस्था से होकर गए थे, और उस अवस्था में भगवान उनके साथ थे। वह अवस्था अन्त नहीं, एक नए बोध का आरम्भ हो सकती है।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-24
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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