यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्
yady apy ete na paśhyanti lobhopahata-chetasaḥ kula-kṣhaya-kṛitaṁ doṣhaṁ mitra-drohe cha pātakam
even though
they
not
see
greed
overpowered
thoughts
in annihilating their relatives
fault
to wreak treachery upon friends
and
sin
अर्थMeaning
(श्लोक 38–39) यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों न करें?
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Though these people, whose minds are overpowered by greed, see no evil in the destruction of a clan and no sin in treachery to friends,
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अर्जुन अब एक ऐसा तर्क देता है जिसमें वह कौरवों और पाण्डवों के ज्ञान में भेद करता है। यह तर्क अगले श्लोक में पूरा होता है। 'यद्यप्येते न पश्यन्ति', यद्यपि ये नहीं देखते, 'लोभोपहतचेतसः', जिनका चित्त लोभ से नष्ट हो गया है, 'कुलक्षयकृतं दोषम्', कुल के नाश से होनेवाले दोष को, 'मित्रद्रोहे च पातकम्', और मित्रों से द्रोह करने के पाप को। 'लोभोपहतचेतसः', जिनका चित्त लोभ से मारा गया है, यह शब्द बहुत तीक्ष्ण और सटीक है। अर्जुन कहता है कि दुर्योधन और उसके साथी लोभ से इतने अन्धे हो गए हैं कि वे यह भी नहीं देख पा रहे कि यह युद्ध उनके अपने कुल का नाश कर देगा। लोभ ने उनके विवेक को उसी प्रकार ढक दिया है जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं। 'मित्रद्रोहे पातकम्', मित्रों से द्रोह का पाप, यह शब्द एक गहरी वेदना लिए हुए है। कौरव और पाण्डव एक साथ पले, एक ही गुरु से पढ़े, एक ही आँगन में खेले। वे केवल भाई नहीं, बचपन के साथी भी थे। और आज वे एक-दूसरे के रक्त के प्यासे हैं। अर्जुन यह मानता है कि दुर्योधन लोभ के कारण यह पाप नहीं देख पा रहा, पर इसका अर्थ यह नहीं कि पाण्डव भी आँखें मूँद लें। यह श्लोक आपको लोभ के सबसे बड़े संकट का स्मरण कराता है: वह आँखें होते हुए भी अन्धा बना देता है। जब कोई लाभ आपको बहुत आकर्षित करे, तो एक क्षण रुककर पूछिए: क्या यह लोभ मेरी दृष्टि को ढक तो नहीं रहा?
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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