अर्जुन उवाचहृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत
arjuna uvācha senayor ubhayor madhye rathaṁ sthāpaya me ’chyuta
Arjun said
armies
both
in the middle
chariot
place
my
Shree Krishna, the infallible One
अर्थMeaning
(श्लोक 21–22) अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
And he spoke, O Lord of the Earth, these words to Sri Krishna: Arjuna said, “Draw up my chariot, O Krishna, between the two armies.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
धनुष उठाकर अर्जुन अपने सारथी से एक प्रार्थना करता है, और यह प्रार्थना अगले श्लोक में पूरी होती है। 'हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते', हे राजन्, तब अर्जुन ने हृषीकेश से यह वचन कहा: 'सेनयोरुभयोर्मध्ये', दोनों सेनाओं के बीच में, 'रथं स्थापय मेऽच्युत', हे अच्युत, मेरे रथ को खड़ा कीजिए। इस श्लोक में एक अद्भुत दृश्य है, जिस पर गहराई से विचार करने पर हृदय भर आता है। अर्जुन अपने सारथी को आदेश दे रहा है: 'स्थापय', खड़ा कीजिए। और वह सारथी कौन है? स्वयं भगवान, जो सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं। वे एक सेवक की भाँति अपने भक्त के आदेश का पालन करने को तैयार हैं। यह भगवान की उस करुणा का चित्र है जिसमें वे अपने प्रेमी के लिए सारथी बनना भी स्वीकार कर लेते हैं। 'अच्युत', जो कभी अपने स्थान से च्युत नहीं होते, यह सम्बोधन बहुत अर्थपूर्ण है। अर्जुन उन्हें अच्युत कहकर पुकार रहा है, और उनसे अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच ले जाने को कह रहा है, उस स्थान पर जहाँ से वह दोनों पक्षों को देख सके। अर्जुन को नहीं पता कि वह जिस स्थान पर जा रहा है, वहाँ उसका पूरा जीवन बदल जाएगा। 'उभयोर्मध्ये', दोनों के बीच, यह स्थान प्रतीकात्मक भी है: जहाँ से मनुष्य दोनों पक्षों को एक साथ देखता है, वहीं से उसका सच्चा द्वन्द्व आरम्भ होता है। यह श्लोक आपको बताता है कि जब आप जीवन के किसी द्वन्द्व के बीच खड़े हों, तो भगवान को सारथी बनाकर ही वहाँ जाइए।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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