अर्जुन उवाचकृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्
arjuna uvācha dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam
Arjun said
on seeing
these
kinsmen
Krishna
eager to fight
present
अर्थMeaning
(श्लोक 28–30) अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
He was filled with deep compassion and said these words in despair:
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अब अर्जुन बोलता है, और उसके शब्दों में एक टूटे हुए हृदय की पीड़ा है। यह वर्णन तीन श्लोकों तक चलता है। 'कृपया परयाऽऽविष्टः', अत्यन्त करुणा से भरकर, 'विषीदन्निदमब्रवीत्', विषाद करते हुए उसने यह कहा: 'दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण', हे कृष्ण, इन स्वजनों को, 'युयुत्सुं समुपस्थितम्', युद्ध की इच्छा से सामने उपस्थित देखकर। 'कृपया परयाऽऽविष्टः', अत्यन्त करुणा से आविष्ट, यह शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण है। अर्जुन की यह अवस्था क्रूरता या भय से नहीं, करुणा से उत्पन्न हुई है। वह एक कोमल हृदयवाला व्यक्ति है, जो अपने प्रियजनों को मारने की कल्पना से ही काँप उठता है। पर भगवान आगे इस करुणा को 'कश्मल', मोह, कहेंगे। क्यों? क्योंकि यह करुणा विवेक से नहीं, ममता से उपजी है। सच्ची करुणा कर्तव्य से नहीं भागती। 'स्वजनम्', अपने लोग, यह शब्द इस श्लोक का हृदय है। अर्जुन अब उन्हें 'धार्तराष्ट्र' या 'शत्रु' नहीं कहता। अब वे 'स्वजन' हैं, अपने लोग। जिस क्षण शत्रु 'अपना' बन जाता है, उस क्षण युद्ध असम्भव लगने लगता है। और 'विषीदन्', विषाद करते हुए, इसी शब्द से इस अध्याय का नाम पड़ा है: 'अर्जुनविषादयोग'। यह विषाद ही गीता के उपदेश का द्वार है। यह श्लोक आपको बताता है कि करुणा एक सुन्दर गुण है, पर जब वह विवेक से अलग हो जाए, तो वह मोह बन सकती है। अपनी करुणा को सदा विवेक के प्रकाश में परखिए।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
जब शरीर में घबराहट हो, यह संकेत है कि मन किसी गहरे द्वंद्व में है। रुको, गहरी श्वास लो — भय को पहचानना ही उसे शक्ति में बदलने का पहला कदम है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
अचानक भय या संकट में शरीर काँपना, मुख सूखना और मांसपेशियों का तनना जैसी प्रतिक्रियाएँ कुछ लोगों में दिख सकती हैं; उनका रूप और तीव्रता अलग-अलग होती है। अर्जुन के वर्णन को इस देहगत अनुभव से जोड़कर पढ़ा जा सकता है, पर यह चिकित्सकीय निदान नहीं और न श्लोक का वैज्ञानिक प्रमाण है। यहाँ आधुनिक मनोविज्ञान का सीमित साम्य इतना है कि गहरा मानसिक संकट शरीर में भी अनुभूत हो सकता है।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
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- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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