श्रीमद्भगवद्गीता

Arjuna Visada Yogaश्लोक 6/4713%

Bhagavad Gita 1.6

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 4–6) यहाँ (पाण्डवों की सेना में) बड़े-बड़े शूरवीर हैं, जिनके बहुत बड़े-बड़े धनुष हैं तथा जो युद्ध में भीम और अर्जुनके समान हैं। उनमें युयुधान (सात्यकि), राजा विराट और महारथी द्रुपद भी हैं। धृष्टकेतु और चेकितान तथा पराक्रमी काशिराज भी हैं। पुरुजित् और कुन्तिभोज--ये दोनों भाई तथा मनुष्योंमें श्रेष्ठ शैब्य भी हैं। पराक्रमी युधामन्यु और पराक्रमी उत्तमौजा भी हैं। सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र भी हैं। ये सब-के-सब महारथी हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Yudhamanyu, the valiant one, and Uttamaujas, the strong one; and also the son of Subhadra, as well as the sons of Draupadi, all mighty warriors.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

पाण्डव-सेना के वीरों की सूची यहाँ पूरी होती है, और अन्त में कुछ ऐसे नाम आते हैं जो इस युद्ध की करुणा को और गहरा कर देते हैं। 'युधामन्युश्च विक्रान्तः', पराक्रमी युधामन्यु, 'उत्तमौजाश्च वीर्यवान्', और बलवान उत्तमौजा, 'सौभद्रो द्रौपदेयाश्च', सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र, 'सर्व एव महारथाः', ये सभी महारथी हैं। इस श्लोक के दो नाम हृदय को भारी कर देते हैं: 'सौभद्रः', अभिमन्यु, और 'द्रौपदेयाः', द्रौपदी के पाँच पुत्र। ये सब युवा हैं, लगभग बालक। अभिमन्यु अर्जुन और सुभद्रा का पुत्र था, और द्रौपदी के पाँचों पुत्र पाँचों पाण्डवों से थे। जो लोग महाभारत की कथा जानते हैं, उन्हें स्मरण है कि इनमें से कोई भी इस युद्ध से जीवित नहीं लौटा। अभिमन्यु चक्रव्यूह में वीरगति को प्राप्त हुआ, और द्रौपदी के पुत्र युद्ध के बाद रात्रि में मारे गए। 'सर्व एव महारथाः', ये सभी महारथी हैं, दुर्योधन इन युवाओं को भी महारथी कहता है। महारथी वह था जो अकेले हज़ारों योद्धाओं से लड़ सके। इतनी छोटी आयु में ऐसा पराक्रम! पर इस वीरता के पीछे एक करुण भविष्य छिपा है। युद्ध सबसे पहले सबसे युवा और सबसे होनहार जीवनों को ले जाता है। यह श्लोक युद्ध के उस मूल्य का स्मरण कराता है जो अन्ततः परिवारों को चुकाना पड़ता है। यह आपको सिखाता है कि किसी भी संघर्ष को आरम्भ करने से पहले उसके मूल्य पर गम्भीरता से विचार कीजिए, विशेषकर उनके लिए जो सबसे निर्दोष हैं।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-22
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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