कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन
kathaṁ na jñeyam asmābhiḥ pāpād asmān nivartitum kula-kṣhaya-kṛitaṁ doṣhaṁ prapaśhyadbhir janārdana
why
not
should be known
we
from sin
these
to turn away
killing the kindered
done
crime
who can see
he who looks after the public, Shree Krishna
अर्थMeaning
(श्लोक 38–39) यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होनेका विचार क्यों न करें?
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Why should we not learn to shun this crime—we who see the evil of ruining a clan, O Krishna?
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अर्जुन का तर्क यहाँ पूरा होता है, और वह एक प्रश्न के रूप में आता है। 'कथं न ज्ञेयमस्माभिः', हम लोगों को यह क्यों नहीं जानना चाहिए, 'पापादस्मान्निवर्तितुम्', कि इस पाप से हमें निवृत्त होना चाहिए, 'कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन', हे जनार्दन, जब हम कुल के नाश से होनेवाले दोष को भली-भाँति देख रहे हैं? अर्जुन का तर्क अब स्पष्ट है: यदि कौरव लोभ के कारण अन्धे हैं, तो क्या हमें भी उनके साथ अन्धा हो जाना चाहिए? हम तो देख रहे हैं कि यह युद्ध कुल का विनाश करेगा। तो फिर जानते हुए हम यह पाप क्यों करें? यह एक बहुत सशक्त नैतिक तर्क है, और इसमें एक सच्चाई है: जिसे अधिक ज्ञान है, उसका उत्तरदायित्व भी अधिक है। 'प्रपश्यद्भिः', भली-भाँति देखनेवाले, यह शब्द अर्जुन के आत्मविश्वास को प्रकट करता है। उसे लगता है कि वह स्थिति को भली-भाँति देख रहा है। पर गीता का पूरा उपदेश यही दिखाएगा कि अर्जुन वास्तव में स्थिति का केवल एक पक्ष देख रहा है: कुल का नाश। वह यह नहीं देख रहा कि अधर्म को रोकना भी एक धर्म है, और उसे न रोकना भी एक पाप होगा। यह श्लोक आपको एक विनम्रता सिखाता है। जब आपको लगे कि आप किसी स्थिति को भली-भाँति देख रहे हैं, तब भी यह सम्भावना खुली रखिए कि कोई और पक्ष आपकी दृष्टि से छूट रहा हो। गुरु और शास्त्र से पूछना इसीलिए आवश्यक है।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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