अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्
aparyāptaṁ tadasmākaṁ balaṁ bhīṣhmābhirakṣhitam paryāptaṁ tvidameteṣhāṁ balaṁ bhīmābhirakṣhitam
unlimited
that
ours
strength
by Grandsire Bheeshma
safely marshalled
limited
but
this
their
strength
Bheem
carefully marshalled
अर्थMeaning
वह हमारी सेना पाण्डवों पर विजय करने में अपर्याप्त है, असमर्थ है; क्योंकि उसके संरक्षक (उभयपक्षपाती) भीष्म हैं। परन्तु इन पाण्डवों की सेना हमारे पर विजय करने में पर्याप्त है, समर्थ है; क्योंकि इसके संरक्षक (निजसेनापक्षपाती) भीमसेन हैं।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Our force is inadequate, guarded by Bhisma, while their force is adequate, guarded by Bhima.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अब दुर्योधन एक ऐसी बात कहता है जिसके अर्थ पर टीकाकारों में बहुत विचार हुआ है, और जो उसके मन के भीतरी संशय को प्रकट करती है। 'अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्', भीष्म के द्वारा रक्षित हमारी वह सेना अपर्याप्त है, 'पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्', पर भीम के द्वारा रक्षित इनकी यह सेना पर्याप्त है। इस श्लोक के दो अर्थ परम्परा में किए गए हैं। एक अर्थ में 'अपर्याप्त' का अर्थ है असीम, अर्थात् हमारी सेना अपार है, और उनकी सेना सीमित। दूसरा अर्थ, जिसे गीता प्रेस स्वीकार करती है, यह है कि हमारी सेना विजय के लिए असमर्थ है, क्योंकि उसके संरक्षक भीष्म दोनों पक्षों से प्रेम करते हैं; और पाण्डवों की सेना समर्थ है, क्योंकि उसका संरक्षक भीम सर्वथा अपने पक्ष का है। दूसरा अर्थ दुर्योधन के मन को बहुत गहराई से प्रकट करता है। वह जानता है कि पितामह भीष्म हृदय से पाण्डवों से भी उतना ही प्रेम करते हैं जितना कौरवों से। वे केवल अपनी प्रतिज्ञा के कारण इस पक्ष में हैं। जिस सेना का सेनापति ही भीतर से विभाजित हो, उसकी शक्ति आधी रह जाती है। और भीम, जिसने कौरवों के विनाश की प्रतिज्ञा ली थी, पूरे मन से लड़ेगा। यह श्लोक एक गहरा सत्य बताता है: किसी भी समूह की शक्ति उसकी संख्या में नहीं, उसके हृदयों की एकता में है। आप जिस भी कार्य में लगें, उसमें पूरे हृदय से लगिए, आधे मन से नहीं।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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