निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे
nimittāni cha paśhyāmi viparītāni keśhava na cha śhreyo ’nupaśhyāmi hatvā sva-janam āhave
omens
and
I see
misfortune
Shree Krishna, killer of the Keshi demon
not
also
good
I foresee
from killing
kinsmen
in battle
अर्थMeaning
हे केशव! मैं लक्षणों - (शकुनों) को भी विपरीत देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनोंको मारकर श्रेय (लाभ) भी नहीं देख रहा हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
I see, Kṛṣṇa, inauspicious omens. I foresee no good in slaying my kinsmen in battle.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
शरीर और मन की व्याकुलता के बाद अर्जुन अब अपने भीतर उठ रहे तर्क प्रकट करना आरम्भ करता है। 'निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव', हे केशव, मैं लक्षणों को भी विपरीत देख रहा हूँ, 'न च श्रेयोऽनुपश्यामि', और मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता, 'हत्वा स्वजनमाहवे', युद्ध में स्वजनों को मारकर। 'निमित्तानि विपरीतानि', विपरीत लक्षण, अर्जुन को चारों ओर अशुभ शकुन दिखाई दे रहे हैं। यह एक व्याकुल मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति है: जब मन किसी कार्य से भयभीत होता है, तो उसे हर ओर उस कार्य के विरुद्ध संकेत दिखने लगते हैं। जैसे जो व्यक्ति यात्रा से डरता हो, उसे हर छोटी बाधा एक अपशकुन लगती है। पर इस श्लोक की दूसरी पंक्ति अधिक गहरी है: 'न च श्रेयोऽनुपश्यामि', मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता। अर्जुन अब केवल भावना से नहीं, तर्क से सोचने लगा है। वह पूछ रहा है: इस युद्ध का क्या लाभ? अपनों को मारकर जो विजय मिलेगी, उसमें क्या सुख होगा? यह एक गम्भीर, विचारशील प्रश्न है, और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। अर्जुन का यह प्रश्न ही आगे के पूरे उपदेश का आधार बनेगा, क्योंकि भगवान उसे 'श्रेय', वास्तविक कल्याण, का अर्थ समझाएँगे। यह श्लोक आपको बताता है कि जब मन भय में होता है, तो वह अपने निर्णय को उचित ठहराने के लिए तर्क खोज लेता है। अपने तर्कों की परख कीजिए: वे विवेक से उपजे हैं, या भय से?
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
जब सब कुछ बुरा लगे, तो एक क्षण रुककर पूछो — क्या यह वास्तविकता है, या मेरे भय का प्रक्षेपण? मन की अवस्था बदलो, और संसार बदला हुआ दिखेगा।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
जब मन पहले से भयभीत हो, तो वह कुछ संकेतों को अपने भय के अनुकूल अर्थ दे सकता है; पर यह प्रतिक्रिया हर व्यक्ति या परिस्थिति में समान नहीं होती। अर्जुन का विपरीत निमित्त देखना इस सम्भावना की याद दिलाता है। इसे किसी मानसिक प्रवृत्ति का निश्चित निदान या श्लोक का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मानना चाहिए। पढ़ते समय यह प्रश्न उपयोगी है: क्या मैं घटना देख रहा हूँ, या अपने भय से उसका अर्थ बना रहा हूँ?
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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