यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्
yadi mām apratīkāram aśhastraṁ śhastra-pāṇayaḥ dhārtarāṣhṭrā raṇe hanyus tan me kṣhemataraṁ bhavet
if
me
unresisting
unarmed
those with weapons in hand
the sons of Dhritarashtra
on the battlefield
shall kill
that
to me
better
would be
अर्थMeaning
अगर ये हाथों में शस्त्र-अस्त्र लिये हुए धृतराष्ट्र के पक्षपाती लोग युद्धभूमि में सामना न करनेवाले तथा शस्त्ररहित मुझ को मार भी दें, तो वह मेरे लिये बड़ा ही हितकारक होगा।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
If the well-armed sons of Dhrtarastra should slay me in battle, unresisting and unarmed, that would be better for me.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अर्जुन अपना अन्तिम निर्णय सुनाता है, और यह निर्णय उसके पूरे विषाद की पराकाष्ठा है। 'यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः', यदि शस्त्र हाथ में लिए हुए, 'धार्तराष्ट्रा रणे हन्युः', धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में मुझ प्रतिकार न करनेवाले और शस्त्ररहित को मार भी दें, 'तन्मे क्षेमतरं भवेत्', तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा। इस श्लोक में अर्जुन अपने लिए मृत्यु चुन रहा है। 'अप्रतीकारम्', प्रतिकार न करते हुए, 'अशस्त्रम्', शस्त्ररहित, वह कह रहा है कि वह अपना धनुष रख देगा, अपनी रक्षा भी नहीं करेगा, और यदि कौरव उसे मार दें, तो वह इसे भी स्वीकार कर लेगा। यह एक ऐसे व्यक्ति का निर्णय है जिसके लिए जीवन का बोझ असहनीय हो गया है। पहली दृष्टि में यह त्याग का एक ऊँचा आदर्श लगता है: दूसरों को मारने से अच्छा है स्वयं मर जाना। और इसमें अर्जुन के हृदय की कोमलता सच्ची है। पर भगवान आगे स्पष्ट करेंगे कि यह त्याग नहीं, पलायन है। अपने धर्म से भागना, अपने कर्तव्य को छोड़ देना, चाहे वह कितना भी करुण कारण से हो, एक प्रकार की दुर्बलता है। 'क्षेमतरम्', अधिक कल्याणकारी, अर्जुन अपनी मृत्यु को कल्याण मान रहा है, पर वास्तविक कल्याण कर्तव्य के पालन में है। यह श्लोक आपको उस क्षण को पहचानना सिखाता है जब निराशा त्याग का रूप धारण कर लेती है। कठिनाई से भागना और त्याग करना, दोनों अलग हैं।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
जब "कुछ न करना" सबसे सुरक्षित लगने लगे — यह पलायन है, समाधान नहीं। यही वह संकट-बिंदु है जहाँ से वास्तविक परिवर्तन शुरू होता है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
तीव्र तनाव में कुछ लोग पीछे हटने, रुक जाने या निर्णय टालने की ओर जा सकते हैं; हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती, और कभी हटना सचमुच सुरक्षा भी देता है। अर्जुन का शस्त्र छोड़ देने का विचार इस मानवीय सम्भावना से जोड़ा जा सकता है। यह रोग-निदान नहीं, न श्लोक का वैज्ञानिक प्रमाण। गीता के आगे के संवाद में उन्हें सहारा और विवेक मिलता है; इसलिए संकट में सहायता माँगना भी एक उचित मानवीय विकल्प है।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
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- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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