श्रीमद्भगवद्गीता

Sankhya Yogaश्लोक 38/7253%

Bhagavad Gita 2.38

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Holding pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat as equal, gird yourself up for the battle. Thus, you shall not incur any sin.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

यह श्लोक गीता के पूरे कर्म-दर्शन का बीज है, और इसके शब्दों में एक गहरी शांति है। 'सुखदुःखे समे कृत्वा', सुख और दुःख को समान करके; 'लाभालाभौ', लाभ और हानि को; 'जयाजयौ', विजय और पराजय को। तीन जोड़े, जो मनुष्य के पूरे भावनात्मक जीवन को घेरे रहते हैं, और भगवान कहते हैं: इन सबको एक तराजू पर रख दो। इसका अर्थ भावनाहीन हो जाना नहीं है। इसका अर्थ है कि आपका कर्म इन द्वन्द्वों से संचालित न हो। आप लड़ें, पर इसलिए नहीं कि जीतना है; आप प्रयत्न करें, पर इसलिए नहीं कि लाभ चाहिए। जब मन इन जोड़ों के झूले से उतर जाता है, तब वह स्थिर होकर कर्म कर पाता है, जैसे शांत जल में चंद्रमा का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखता है। 'ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि', फिर युद्ध में लग जाओ; इस प्रकार तुम्हें पाप नहीं लगेगा। यहाँ एक क्रांतिकारी बात कही गई है: पाप कर्म से नहीं, कर्म के पीछे के भाव से बँधता है। जो व्यक्ति स्वार्थ, द्वेष और फल की लालसा से रहित होकर अपना कर्तव्य निभाता है, उसे वह कर्म नहीं बाँधता। अपने दैनिक जीवन में इसका अभ्यास कीजिए: कोई भी कार्य करने से पहले एक क्षण रुककर मन से कहिए, 'मैं इसे पूरी निष्ठा से करूँगा, परिणाम जो भी हो।'

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक युग का व्यक्ति निर्णय-पंगुता (decision paralysis) और विफलता के आतंक से अत्यधिक ग्रस्त है। किसी भी नए उद्यम, करियर परिवर्तन, शोध अथवा बड़े निर्णय के समय मन केवल संभावित लाभ-हानि, यश-अपयश और सुख-दुःख के मानसिक हिसाब-किताब में उलझकर रह जाता है। इस अति-विश्लेषण (overthinking) के कारण व्यक्ति या तो साहस जुटा ही नहीं पाता, अथवा यदि कार्य आरम्भ भी करता है तो भय और आशंका के निरंतर दबाव में जीता है। आधुनिक समाज हमें सिखाता है कि कार्य केवल तभी सार्थक है जब परिणाम में विजय, भारी मुनाफा और प्रशंसा मिले। परिणामतः, किसी विफलता की संभावना मात्र से ही व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य छिन्न-भिन्न हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण कर्मक्षेत्र में उतरने से पूर्व मन को तैयार करने का एक अभूतपूर्व मनोवैज्ञानिक सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं: "सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व..."। कृष्ण कहते हैं कि पहले सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को मन में एक समान मान लो, और फिर अपने कर्तव्य-युद्ध में जुट जाओ। यहाँ 'समान मानने' का अर्थ यह नहीं है कि आपको हानि या लाभ में कोई अंतर नहीं पता चलेगा; इसका अर्थ यह है कि आपके कर्म करने का संकल्प बाह्य परिणामों की अनुकूलता का मोहताज नहीं होना चाहिए। जब आप यह स्वीकार कर लेते हैं कि जीवन एक गतिशील यात्रा है जिसमें लाभ और हानि दोनों स्वाभाविक चरण हैं, तब विफलता का आतंक स्वतः विसर्जित हो जाता है। आप परिणामों के भय से मुक्त होकर वर्तमान क्षण के कार्य में अपनी संपूर्ण मेधा और निष्ठा को समर्पित कर पाते हैं। जब अंतःकरण से द्वंद्वों का यह भय मिट जाता है, तब किया गया कोई भी कर्म मनुष्य को अपराध-बोध या मानसिक संताप में नहीं बांधता।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- उद्यम व स्टार्टअप: किसी नए विचार, शोध या व्यवसाय को आरम्भ करते समय लाभ और हानि दोनों की संभावनाओं को यथार्थवादी दृष्टि से स्वीकारें; भय के कारण रुकने के बजाय पूर्ण तैयारी के साथ निर्भय होकर आगे बढ़ें। - निर्णय-पंगुता पर विजय: जब किसी कठिन निर्णय के समय मन आशंकाओं में घिर जाए, तो स्वयं से कहें कि मेरा दायित्व श्रेष्ठतम प्रयास करना है; परिणाम चाहे जो हो, वह एक मूल्यवान अनुभव बनकर मुझे परिपक्व ही करेगा। - खेल व प्रतिस्पर्धा: किसी भी परीक्षा, साक्षात्कार या खेल के दौरान केवल विजय की चिंता में अपनी ऊर्जा नष्ट न करें; मन को शांत रखकर खेल के वास्तविक आनंद और कौशल पर एकाग्र रहें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरा वर्तमान जीवन और निर्णय केवल संभावित लाभ-हानि के भय से नियंत्रित हो रहे हैं, अथवा मुझमें सुख-दुःख को समान मानकर अपने सच्चे कर्तव्य में पूरी शक्ति से प्रवृत्त होने का साहस है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

भावनात्मक नियमन और समता पर शोध (Kabat-Zinn): बाहरी घटनाओं के बावजूद स्थिर भावनात्मक अवस्था बनाए रखने की क्षमता मनोवैज्ञानिक दृढ़ता की पहचान है। अध्ययन दर्शाते हैं कि समता-प्रशिक्षण एमिग्डाला की प्रतिक्रियाशीलता घटाता है और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स के नियमन को बढ़ाता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

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  • Translation · from the source archive

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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