बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्
buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛita-duṣhkṛite tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśhalam
endowed with wisdom
get rid of
in this life
both
good and bad deeds
therefore
for Yog
strive for
yog is
the art of working skillfully
अर्थMeaning
बुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
A person with an evenness of mind discards both good and evil here and now. Therefore, strive for Yoga; for Yoga is skill in action.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
इस श्लोक में गीता का एक और अमर सूत्र आता है, जिसने जीवन के हर क्षेत्र में काम करने वालों को प्रेरित किया है। 'बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते', समता से युक्त व्यक्ति इसी जीवन में पुण्य और पाप, दोनों के बंधन से मुक्त हो जाता है। 'तस्माद्योगाय युज्यस्व', इसलिए योग में लग जाओ। 'योगः कर्मसु कौशलम्', योग ही कर्मों में कुशलता है। 'उभे', दोनों, यह शब्द चौंकाने वाला है। पाप से मुक्ति तो समझ में आती है, पर पुण्य से भी? भगवान का अर्थ यह है कि पुण्य कर्म भी, यदि उसके पीछे फल की आसक्ति हो, एक सुनहरी जंजीर बन जाता है। स्वर्ग का सुख भी अंततः एक बंधन है जो समाप्त होता है। समता वाला व्यक्ति कर्म करता है, पर उसके फल की गाँठ नहीं बाँधता; इसलिए न पाप उसे नीचे खींचता है, न पुण्य उसे किसी नए बंधन में बाँधता है। और 'योगः कर्मसु कौशलम्', इसका सौंदर्य यह है कि भगवान कौशल को केवल तकनीकी निपुणता नहीं कहते। सच्चा कौशल वह है जिसमें कर्म भी पूरी निपुणता से हो, और कर्म करने वाला भी उससे बँधे नहीं। जैसे एक कुशल नाविक तूफानी जल में भी नाव चलाता है, पर स्वयं डूबता नहीं। अपने कार्य को इसी दृष्टि से देखिए: उसे श्रेष्ठता से कीजिए, और फिर उसे छोड़ दीजिए। यही कर्म की सबसे बड़ी कला है।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
जो भी काम करो — चाहे पढ़ना, लिखना, कोड करना या घर संभालना — उसमें अपनी पूरी आत्मा उंडेल दो, बिना इस चिंता के कि इसका श्रेय किसे मिलेगा। कार्य जब स्वयं में ही पुरस्कार बन जाता है, तब उसमें से सहज ही अद्वितीय उत्कृष्टता प्रकट होती है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
किसी कार्य में तल्लीनता की अवस्था का मनोविज्ञान में अध्ययन हुआ है; कुछ स्थितियों में व्यक्ति को कार्य सुगम और कुशल लग सकता है, पर अनुभव और प्रदर्शन कार्य, व्यक्ति, चुनौती और कौशल पर निर्भर हैं। 'योगः कर्मसु कौशलम्' से यह एक सीमित साम्य रखता है। गीता का कौशल केवल दक्षता या तल्लीनता नहीं, कर्म को बन्धन से मुक्त रखने की साधना है। यह समानता श्लोक का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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