जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि
jātasya hi dhruvo mṛityur dhruvaṁ janma mṛitasya cha tasmād aparihārye ’rthe na tvaṁ śhochitum arhasi
for one who has been born
for
certain
death
certain
birth
for the dead
and
therefore
in this inevitable situation
not
you
lament
befitting
अर्थMeaning
क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
For, death is certain for the born, and rebirth is certain for the dead; therefore, you should not grieve for what is inevitable.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
यह श्लोक मानव जीवन के सबसे निश्चित सत्य को सबसे स्पष्ट शब्दों में रख देता है। 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः', जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है; 'ध्रुवं जन्म मृतस्य च', और जो मर गया है, उसका जन्म भी निश्चित है। 'ध्रुव' शब्द दो बार आता है, मानो भगवान इस सत्य पर दो बार मुहर लगा रहे हों। हम सब यह जानते हैं, फिर भी जीते ऐसे हैं मानो मृत्यु किसी और के लिए हो। महाभारत में ही यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है, और उत्तर था: प्रतिदिन लोग मरते हैं, फिर भी शेष लोग ऐसे जीते हैं जैसे वे सदा रहेंगे। यह श्लोक उसी भ्रम को धीरे से तोड़ता है। 'तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि', इसलिए जो अपरिहार्य है, उस पर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रियजन के जाने पर आँसू न बहें; इसका अर्थ है कि उस दुःख को जीवन भर का बोझ न बनाएँ, और उसके कारण अपना कर्तव्य न छोड़ें। मृत्यु की निश्चितता को स्वीकार करना वास्तव में जीवन को अधिक गहराई से जीना सिखाता है। जो जानता है कि हर क्षण अनमोल है, वह उसे शोक और भय में नहीं गँवाता।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
अपने जीवन में कोई एक अनिवार्य बात पहचानो — वृद्धावस्था, परिवर्तन, हानि। उसका विरोध करने के बजाय स्वीकार का अभ्यास करो। यह निष्क्रियता नहीं है; यह वास्तविकता से लड़ने में ऊर्जा न गँवाना है, ताकि वह ऊर्जा सार्थक कर्म में लगे।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
आधुनिक मनोचिकित्सा की कुछ पद्धतियाँ इस बात पर बल देती हैं कि जो अनिवार्य है और जिसे बदला नहीं जा सकता, उसे स्वीकार करना सीखा जाए, और शक्ति उन कार्यों में लगाई जाए जो हमारे मूल्यों के अनुरूप हैं। अनुभव बताता है कि अनियन्त्रणीय से लड़ते रहना दुःख को बढ़ाता है। मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार करने की भगवान की बात इससे मेल खाती है। यह एक समानता है, श्लोक का वैज्ञानिक दावा नहीं।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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