क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति
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krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati
From anger comes delusion; from delusion confusion of memory; from lost memory the ruin of intellect; and from ruin of intellect one perishes.from anger
comes
clouding of judgement
from clouding of judgement
memory
bewilderment
from bewilderment of memory
destruction of intellect
from destruction of intellect
one is ruined
अर्थMeaning
(श्लोक 62–63) विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Anger leads to delusion, which causes the loss of memory; the loss of memory leads to the destruction of discrimination, and with the destruction of discrimination, one is lost.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
पिछले श्लोक की श्रृंखला यहाँ अपने विनाशकारी अंत तक पहुँचती है। 'क्रोधाद्भवति संमोहः', क्रोध से सम्मोह, अर्थात् विवेक का अंधापन, उत्पन्न होता है; 'संमोहात्स्मृतिविभ्रमः', सम्मोह से स्मृति भ्रमित हो जाती है; 'स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशः', स्मृति के भ्रष्ट होने से बुद्धि का नाश हो जाता है; 'बुद्धिनाशात्प्रणश्यति', और बुद्धि के नाश से मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है। यहाँ 'स्मृति' का अर्थ केवल स्मरण रखना नहीं, बल्कि अपने संस्कारों, मूल्यों, शास्त्रों की शिक्षा और अपने वास्तविक स्वरूप की स्मृति है। क्रोध में व्यक्ति भूल जाता है कि वह कौन है, किससे बात कर रहा है, और उसके शब्दों का क्या परिणाम होगा। एक क्षण का क्रोध वर्षों के संबंधों को, वर्षों की साधना को नष्ट कर सकता है। हम सबने ऐसे क्षणों में ऐसी बातें कही हैं जिनका पछतावा जीवन भर रहा। 'प्रणश्यति', वह नष्ट हो जाता है, यह शब्द बहुत गंभीर है। यह शरीर के नाश की नहीं, उस व्यक्तित्व के पतन की बात है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। पर इस श्लोक में आशा भी छिपी है: यदि पतन का क्रम ज्ञात है, तो उसे किसी भी कड़ी पर तोड़ा जा सकता है। जब क्रोध उठे, तब बोलने से पहले एक क्षण रुकिए, एक गहरी श्वास लीजिए, और स्वयं को स्मरण कराइए कि आप वास्तव में कौन हैं। वही एक क्षण आपको इस पूरी श्रृंखला से बचा सकता है।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
क्रोध के आवेश में कभी कोई महत्वपूर्ण निर्णय मत लो, न कोई पत्र लिखो, न कोई संबंध तोड़ो। उस क्षण तुम्हारी बुद्धि हाइजैक हो चुकी होती है। जब तक मस्तिष्क का तूफान शांत न हो जाए, मौन रहो — अन्यथा एक क्षण का क्रोध जीवन भर के पश्चाताप का कारण बन जाता है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
मनोविज्ञान में कुछ निष्कर्ष संकेत देते हैं कि क्रोध की अवस्था ध्यान और निर्णय को प्रभावित कर सकती है; पर प्रभाव हर व्यक्ति और हर कार्य में एक-सा नहीं होता। इसलिए यह कहना उचित नहीं कि क्रोध से स्मरण और विवेक हमेशा घटते हैं। इस श्लोक की क्रोध से सम्मोह और स्मृति-विभ्रम तक की कड़ी से यह केवल एक सीमित साम्य है, प्रमाण नहीं। गीता यहाँ नैतिक और आध्यात्मिक विवेक की भी चर्चा करती है, जिसे यह मनोवैज्ञानिक समानता पूरा नहीं करती।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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