श्रीमद्भगवद्गीता

Moksha Sanyaas Yogaश्लोक 46/7859%

Bhagavad Gita 18.46

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

From whom all beings arise and by whom all this is pervaded—by worshipping Him with one's own duty, one reaches perfection.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक समाज ने जीवन को दो परस्पर विरोधी खंडों में बाँट दिया है — एक ओर सांसारिक, कॉर्पोरेट अथवा व्यावसायिक जीवन (जहाँ केवल लाभ, प्रतिस्पर्धा और दबाव है) और दूसरी ओर आध्यात्मिक जीवन (जहाँ मंदिर, पूजा या ध्यान है)। अधिकांश लोग सप्ताह के 5 दिन कॉर्पोरेट दबाव में पिसते हैं और सप्ताहांत पर शांति की तलाश करते हैं। यह द्वंद्व गहरे अलगाव (alienation) और कुंठा को जन्म देता है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ कर्मयोग का महानतम सूत्र उद्घाटित करते हैं: "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः" — जिस परमात्मा से समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई है और जो कण-कण में व्याप्त है, उस परमात्मा की अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। गीता के अनुसार पूजा केवल पुष्प चढ़ाने का नाम नहीं है; आपका कोड लिखना, रोगियों की चिकित्सा करना, प्रशासनिक निर्णय लेना, शिक्षण कार्य या घर की व्यवस्था संभालना — यदि सत्यनिष्ठा, उत्कृष्टता और लोक-कल्याण के भाव से किया जाए, तो वह प्रत्येक कार्य साक्षात् ईश्वर की अर्चना बन जाता है। इस दृष्टि के आते ही कार्य का तनाव समाप्त हो जाता है और वह आनंद में बदल जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **डेस्क को वेदी बनाइए**: अपने कार्यस्थल पर प्रवेश करते समय यह भाव रखिए कि आपका कंप्यूटर, आपकी कलम या आपके उपकरण साधना के साधन हैं। प्रत्येक ईमेल, मीटिंग और प्रोजेक्ट को परमात्मा के निमित्त अर्पित एक आहुति समझिए। - **उत्कृष्टता ही भक्ति है**: जब आप अपने कार्य को प्रभु की पूजा मानेंगे, तो उसमें लापरवाही, छल या निम्न गुणवत्ता के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा। आपकी गुणवत्ता ही आपकी प्रार्थना का स्वरूप बन जाएगी। - **थकान का विसर्जन**: जब कार्य अहंकार के तुष्टीकरण के लिए नहीं बल्कि सर्वव्यापी ईश्वर की सेवा के रूप में किया जाता है, तो शाम को मानसिक रिक्थता या बर्नआउट नहीं, अपितु एक गहरी कृतज्ञता की अनुभूति होती है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“यदि आज आपके कार्य का प्रत्यक्ष मूल्यांकन साक्षात् परमात्मा कर रहे हों, तो क्या आप अपने वर्तमान कार्य की गुणवत्ता और नीयत से पूर्णतः संतुष्ट होंगे?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

कार्य-अर्थपूर्णता मनोविज्ञान (Meaning in Work Psychology - Wrzesniewski et al., 2001): जब व्यक्ति अपने काम को केवल 'नौकरी' (Job) या 'करियर' (Career) के बजाय एक 'आह्वान' (Calling) अथवा समाज-सेवा के रूप में देखता है, तो उसकी कार्य-संतुष्टि, मानसिक स्वास्थ्य और उत्पादकता में 300% से अधिक वृद्धि देखी जाती है। उपनिषद और गीता का यह श्लोक सांसारिक श्रम को ही परम आध्यात्मिक साधना (Karmarchana) में रूपांतरित करने का वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Translation · from the source archive

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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